अल्लाह क़यामत के दिन इन तीन लोगों से बात नहीं करेगा
इस्लाम में अल्लाह तआला की रहमत बहुत वसीअ है। इंसान अगर सच्चे दिल से तौबा करे तो अल्लाह उसके गुनाहों को माफ़ कर सकता है। लेकिन कुछ गुनाह और कुछ ऐसी बुरी आदतें हैं जिनके बारे में रसूलुल्लाह ﷺ ने बहुत सख़्त चेतावनी दी है।
सहीह मुस्लिम की एक हदीस में हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“तीन लोग ऐसे हैं जिनसे अल्लाह क़यामत के दिन न बात करेगा, न उन्हें पाक करेगा और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है।”
इस हदीस में तीन लोगों का ज़िक्र किया गया है।
1. बूढ़ा ज़ानिकार
पहला शख़्स वह है जो बुढ़ापे की उम्र में भी ज़िना करता है।
ज़िना इस्लाम में बहुत बड़ा गुनाह है। लेकिन जब इंसान की उम्र बढ़ जाती है और उसकी जवानी की वह ताक़त भी नहीं रहती जिसके कारण अक्सर इंसान अपनी ख्वाहिशों के पीछे जाता है, फिर भी वह जान-बूझकर ज़िना करता रहे, तो यह उसके लिए और भी ज़्यादा शर्मनाक और गंभीर मामला है।
इसी वजह से हदीस में “शैख़ ज़ानिन” यानी बूढ़े ज़ानिकार का विशेष रूप से ज़िक्र आया है।
2. झूठा बादशाह या हाकिम
दूसरा शख़्स वह है जो हुकूमत और इख़्तियार रखने के बावजूद झूठ बोलता है।
हदीस में “मलिक कज़्ज़ाब” यानी बहुत झूठ बोलने वाले बादशाह का ज़िक्र किया गया है।
जिस इंसान के पास इख़्तियार, ताक़त और लोगों पर हुक्म चलाने की ताक़त हो, उसके लिए झूठ से बचना और इंसाफ़ करना और भी ज़रूरी है। अगर ऐसा व्यक्ति लगातार झूठ बोलता है और लोगों को धोखा देता है, तो यह बहुत गंभीर गुनाह है।
3. ग़रीब होकर तकब्बुर करने वाला
तीसरा शख़्स वह है जो ग़रीब होने के बावजूद तकब्बुर करता है।
आमतौर पर इंसान को माल, दौलत, शोहरत या ताक़त मिलने के बाद घमंड पैदा हो सकता है। लेकिन हदीस में उस व्यक्ति के बारे में विशेष चेतावनी दी गई है जिसके पास दुनिया की दौलत नहीं है, फिर भी वह लोगों के सामने तकब्बुर करता है और अपने आपको दूसरों से बड़ा समझता है।
इन तीनों में क्या समानता है?
इन तीनों मामलों में एक अहम बात दिखाई देती है: इंसान के पास गुनाह से बचने की वजह मौजूद होने के बावजूद वह गुनाह को अपनाता है।
बूढ़े व्यक्ति के लिए अपनी उम्र को देखते हुए ज़िना छोड़ देना चाहिए था।
हुक्मरान के पास ताक़त होने के बावजूद उसे झूठ और धोखे से बचना चाहिए था।
और ग़रीब व्यक्ति के पास दुनिया की दौलत न होने के बावजूद उसे अल्लाह के बंदों के सामने विनम्र रहना चाहिए था।
लेकिन ये लोग इन बुराइयों को छोड़ने के बजाय उनमें पड़े रहते हैं।
क्या इसका मतलब है कि तौबा का दरवाज़ा बंद हो जाता है?
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना ज़रूरी है। हदीस में क़यामत के दिन मिलने वाली सख़्त सज़ा और अल्लाह की नाराज़गी की चेतावनी दी गई है। इसका मतलब यह नहीं कि इंसान दुनिया में रहते हुए सच्ची तौबा नहीं कर सकता।
अगर कोई व्यक्ति अपने गुनाह से सच्चे दिल से तौबा कर ले, गुनाह छोड़ दे और अल्लाह की तरफ़ लौट आए, तो अल्लाह की रहमत से मायूस नहीं होना चाहिए।
इसलिए इस हदीस का मक़सद इंसान को मायूस करना नहीं, बल्कि गुनाहों से डराना और तौबा की तरफ़ बुलाना है।
हमें इस हदीस से क्या सबक मिलता है?
इस हदीस से हमें कई अहम सबक मिलते हैं:
- ज़िना से हर हाल में बचना चाहिए।
- झूठ बोलना, खासकर इख़्तियार और ज़िम्मेदारी रखने वाले व्यक्ति के लिए, बहुत गंभीर मामला है।
- तकब्बुर इंसान को अल्लाह की नाराज़गी के करीब कर सकता है।
- दौलत कम या ज़्यादा होना इंसान की असली इज़्ज़त का पैमाना नहीं है।
- इंसान को अपनी उम्र, हैसियत और हालात के बावजूद अल्लाह से डरना चाहिए।
- गुनाह हो जाए तो मायूस होने के बजाय सच्ची तौबा करनी चाहिए।
आख़िरी बात
रसूलुल्लाह ﷺ की यह हदीस हमें झकझोर देने वाली चेतावनी देती है। इंसान को अपनी ज़िंदगी में यह देखना चाहिए कि कहीं वह किसी ऐसे गुनाह में तो मुब्तला नहीं जिसे वह मामूली समझ रहा है।
अल्लाह हमें ज़िना, झूठ, तकब्बुर और तमाम बड़े गुनाहों से बचाए, हमें सच्ची तौबा करने की तौफ़ीक़ दे और क़यामत के दिन अपनी रहमत और मग़फ़िरत से नवाज़े।
आमीन या रब्बल आलमीन।






