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Quran surah fatiha | history bukhari

سورۃ الفاتحہ

تعارف

سورۃ الفاتحہ قرآنِ مجید کی پہلی سورت ہے اور اس میں سات آیات ہیں۔ اسے فاتحۃ الکتاب بھی کہا جاتا ہے، یعنی کتاب کی ابتدا کرنے والی سورت۔ اس کے علاوہ احادیث میں اس کے دوسرے نام بھی ملتے ہیں، جن میں اُمّ الکتاب، السبع المثانی، القرآن العظیم، الشفاء اور الرقیہ وغیرہ شامل ہیں۔

بسم اللہ الرحمن الرحیم

اللہ کے نام سے شروع کرتا ہوں، جو بہت مہربان، نہایت رحم فرمانے والا ہے۔

سورۃ الفاتحہ کی ابتدا اللہ تعالیٰ کی حمد و ثنا سے ہوتی ہے اور اس میں بندہ اللہ تعالیٰ کی عبادت، اس سے مدد طلب کرنے اور سیدھے راستے کی ہدایت کی دعا کرتا ہے۔

سورۃ الفاتحہ کی اہمیت

احادیث میں سورۃ الفاتحہ کی بڑی فضیلت بیان ہوئی ہے۔ ایک حدیثِ قدسی میں اللہ تعالیٰ نے نماز کے بارے میں فرمایا کہ نماز کو بندے اور اللہ تعالیٰ کے درمیان دو حصوں میں تقسیم کیا گیا ہے، اور بندے کے لیے وہی ہے جو وہ مانگتا ہے۔

سورۃ الفاتحہ نماز کا بنیادی حصہ ہے۔ صحیح احادیث میں اس بات کی وضاحت ملتی ہے کہ جو شخص نماز میں سورۃ الفاتحہ نہ پڑھے، اس کی نماز کے بارے میں سخت تنبیہ آئی ہے۔

ایک روایت میں حضرت ابو ہریرہؓ سے منقول ہے کہ رسول اللہ ﷺ نے نماز کے بعد صحابہؓ کی قراءت کے بارے میں رہنمائی فرمائی اور نماز میں قرآن پڑھنے کی اہمیت واضح فرمائی۔

سورۃ الفاتحہ کا مرکزی مضمون

اس سورت میں سب سے پہلے اللہ تعالیٰ کی حمد بیان کی گئی ہے، پھر اللہ تعالیٰ کی رحمت اور قیامت کے دن اس کی بادشاہی کا ذکر ہے۔ اس کے بعد بندہ اقرار کرتا ہے کہ وہ صرف اللہ تعالیٰ ہی کی عبادت کرتا ہے اور اسی سے مدد مانگتا ہے، پھر اللہ تعالیٰ سے سیدھے راستے کی ہدایت طلب کرتا ہے۔

آخر میں ایسے لوگوں کے راستے پر چلنے کی دعا کی گئی ہے جن پر اللہ تعالیٰ نے اپنا انعام فرمایا، نہ کہ ان لوگوں کے راستے پر جو غضب کے مستحق ہوئے یا گمراہی میں پڑ گئے۔





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सूरह अल-फ़ातिहा

तआरुफ़

सूरह अल-फ़ातिहा क़ुरआन-ए-मजीद की पहली सूरत है और इसमें सात आयतें हैं। इसे फ़ातिहतुल-किताब भी कहा जाता है, यानी किताब की इब्तिदा करने वाली सूरत। अहादीस में इसके दूसरे नाम भी मिलते हैं, जिनमें उम्मुल-किताब, अस-सब्अुल-मसानी, अल-क़ुरआनुल-अज़ीम, अश-शिफ़ा और अर-रुक़्या शामिल हैं।

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अल्लाह के नाम से शुरू करता हूँ, जो बहुत मेहरबान, निहायत रहम फ़रमाने वाला है।

सूरह अल-फ़ातिहा की इब्तिदा अल्लाह तआला की हम्द-ओ-सना से होती है। इसमें बंदा अल्लाह तआला की इबादत का इकरार करता है, उसी से मदद मांगता है और सीधे रास्ते की हिदायत की दुआ करता है।

सूरह अल-फ़ातिहा की अहमियत

अहादीस में सूरह अल-फ़ातिहा की बड़ी फ़ज़ीलत बयान हुई है। एक हदीस-ए-क़ुदसी में अल्लाह तआला ने नमाज़ के बारे में फ़रमाया कि नमाज़ को बंदे और अल्लाह तआला के दरमियान दो हिस्सों में तक़सीम किया गया है और बंदे के लिए वही है जो वह मांगता है।

सूरह अल-फ़ातिहा नमाज़ का अहम हिस्सा है। सहीह अहादीस में इसकी क़िराअत की अहमियत बयान हुई है और नमाज़ में इसे पढ़ने के बारे में रहनुमाई मिलती है।

सूरह अल-फ़ातिहा का मरकज़ी मज़मून

इस सूरत में सबसे पहले अल्लाह तआला की हम्द बयान की गई है। इसके बाद अल्लाह तआला की रहमत और क़ियामत के दिन उसकी बादशाहत का ज़िक्र है। फिर बंदा इस बात का इकरार करता है कि वह सिर्फ़ अल्लाह तआला ही की इबादत करता है और उसी से मदद मांगता है।

इसके बाद अल्लाह तआला से सीधे रास्ते की हिदायत मांगी जाती है और ऐसे लोगों के रास्ते पर चलने की दुआ की जाती है जिन पर अल्लाह तआला ने अपना इनाम फ़रमाया। साथ ही उन रास्तों से बचने की दुआ की जाती है जो ग़ज़ब और गुमराही की तरफ़ ले जाते हैं।

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